।।अयोध्या की महिमा।।
अयोध्या जिसे अवध और साकेत भी कहते है, अत्यंत प्राचीन शहर है। यह पहले उत्तर कोशल की राजधानी थी जिसमें "सुख समृद्धि के साथ हिन्दू लोग जिस वस्तु की आकांक्षा करते या जिसका आदर सम्मान करते है। वह सब प्राप्त हो चुका था जैसा कि अब
मिलना असम्भव है और जो उस तेजधारी राजवंश का निवास स्थान था जो सूर्य देव से उत्पन्न हुआ और जिसमे 60 निर्दोष शासकों के पीछे मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र का अवतार हुआ। इस वीर को ऐतिहासिक सम्मान मिलना चाहिए। इतिहास का उस प्रभाव से संबंध है जो इनके चरित्र का इस बड़ी आर्यजाति के सामाजिक और धार्मिक विश्वास पर है और इतिहास यह भी देखता है कि इनकी जन्म भूमि की यात्रा को बड़ी श्रद्धा और भक्ति से यात्रियों की ऐसी भीड़ आती है , जितना किसी दूसरे तीर्थ में नही "
"अयोध्या मथुरा माया काशी अवन्तिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायकः।।
दीपो से बनाई गई अयोध्या की दृश्य
कहने वाले कह सकते है कि छंद में अयोध्या का नाम पहले आना उसके प्राधान्य का प्रमाण नही। परन्तु यह ठीक नही एक प्रसिद्ध श्लोक और है जिससे प्रकट होता है। कि अयोध्या तीर्थ रूपी विष्नु का मस्तक है :-
विष्णोः पादमवन्तिका गुनवर्ती मध्ये च काशीपुरीन।
नाभिं द्वारवतीन्तथा च हृदये मायापुरी।
ग्रीवामूलमुदाहरन्ति मथुरां नासाच् वाराणसीम्
एतद्ब्रम्हविदों वदन्ति मुनियोअयोध्यापुरीं मस्तकम्।।
शेष छः तीर्थो में से अनेक की बड़ाई इसी कोशल राजधानी के सम्बन्ध से हुई है। श्री कृष्ण जी के जन्म से बहुत पहले मथुरा को शत्रुघ्न ने बसाया था, जिनको श्री राम चन्द्र ने यमुना तट पर बसे हुए तपस्वियों के सताने वाले राछस को मारने के लिए भेजा था, माया या मायापुरी हरिद्वार का नामांतरण है जहां अयोध्या के राजा भागीरथी की लायी हुई गंगा पहाड़ों से निकल कर मैदान में आती है और अयोध्या काशी की भूमि को पवित्र करती है।
इन दिनों भी अयोध्या जैन धर्मावलंबियों का ऐसाही तीर्थ है जैसा हिंदुओं का अध्याय 8 मे दिखाया जायेगा कि 24 तीर्थकरों में से 22 इच्छावकुवंशी थे और उनमें से सबसे पहले तीर्थकर आदिनाथ का और चार तीर्थंकर का जन्म यहीं हुआ था।

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